Sunday, February 8, 2026

मधुमक्खियों के हमले के बीच 20 बच्चों की जान बचाकर अमर हो गईं आंगनवाड़ी कार्यकर्ता कंचन बाई मेघवाल

 


भूमिका

मध्य प्रदेश के नीमच ज़िले से सामने आई यह घटना न केवल दिल को झकझोर देने वाली है, बल्कि मानवता, कर्तव्य और साहस की एक ऐसी मिसाल भी है, जिसे आने वाली पीढ़ियाँ लंबे समय तक याद रखेंगी। रानपुर गांव की आंगनवाड़ी कार्यकर्ता कंचन बाई मेघवाल ने अपने प्राणों की परवाह किए बिना 20 मासूम बच्चों की जान बचाकर यह साबित कर दिया कि सच्ची बहादुरी पद या ताकत से नहीं, बल्कि संवेदना और जिम्मेदारी से जन्म लेती है।

क्या है पूरा मामला

यह दुखद घटना उस समय हुई जब रानपुर गांव के आंगनवाड़ी केंद्र में बच्चे रोज़ की तरह खेल रहे थे। अचानक वहां मधुमक्खियों के झुंड ने हमला कर दिया। बच्चों में अफरा-तफरी मच गई और स्थिति बेहद भयावह हो गई।

इसी दौरान 45 वर्षीय आंगनवाड़ी कार्यकर्ता कंचन बाई मेघवाल ने बिना एक पल गंवाए बच्चों को बचाने का निर्णय लिया। उन्होंने एक-एक कर 20 बच्चों को सुरक्षित बाहर निकाला, लेकिन इस दौरान वे खुद मधुमक्खियों के गंभीर डंक का शिकार हो गईं।

बच्चों को जीवनदान, खुद को बलिदान

कंचन बाई ने अंतिम क्षण तक बच्चों को बचाने को ही अपनी प्राथमिकता बनाया। बच्चों को सुरक्षित स्थान तक पहुंचाने के बाद उनकी हालत बेहद गंभीर हो चुकी थी। मधुमक्खियों के असंख्य डंक लगने के कारण मौके पर ही उनका निधन हो गया।

उनका यह बलिदान केवल एक हादसा नहीं, बल्कि एक ऐसी शहादत है, जिसने पूरे समाज को भावुक कर दिया है।

मुख्यमंत्री ने जताया शोक, सरकार ने किया बड़ा ऐलान

इस हृदयविदारक घटना पर मुख्यमंत्री मोहन यादव ने गहरा शोक व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि कंचन बाई मेघवाल ने अद्भुत साहस और मानवीय संवेदना का परिचय दिया है, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता।

राज्य सरकार ने मृतका के परिजनों के लिए निम्न घोषणाएँ कीं:

परिवार को ₹4 लाख रुपये की आर्थिक सहायता

कंचन बाई के बच्चों की पूरी शिक्षा का खर्च सरकार द्वारा वहन

परिवार को हर संभव सहायता का भरोसा

एक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, जो बनीं मां से बढ़कर

कंचन बाई मेघवाल सिर्फ एक सरकारी कर्मचारी नहीं थीं, बल्कि उन बच्चों के लिए मां समान संरक्षक थीं। उनका यह त्याग बताता है कि आंगनवाड़ी कार्यकर्ता केवल सेविका नहीं, बल्कि समाज की नींव होती हैं।

उनकी कहानी हमें यह सिखाती है कि सच्चा कर्तव्य वही है, जिसमें अपने प्राणों से बढ़कर दूसरों का जीवन महत्वपूर्ण हो।

समाज के लिए एक अमर संदेश

कंचन बाई मेघवाल का बलिदान हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि संकट की घड़ी में इंसान क्या चुनता है—डर या जिम्मेदारी। उन्होंने जिम्मेदारी को चुना और अमर हो गईं।

आज वे हमारे बीच भले न हों, लेकिन उनका साहस, उनका त्याग और उनकी ममता हमेशा जीवित रहेगी।

निष्कर्ष

रानपुर गांव की यह घटना एक दर्दनाक त्रासदी होने के साथ-साथ एक प्रेरणादायक कहानी भी है। कंचन बाई मेघवाल ने अपने कर्तव्य का पालन करते हुए जो मिसाल कायम की है, वह पूरे देश के लिए गर्व की बात है।

ऐसी महान आत्माओं को शत-शत नमन।

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